मङ्गलबार, ०६ चैत २०७४, १३ : ३०

राष्ट्रपति बिद्या भंडारी और प्रधानमंत्री केपी ओली सिद्धान्त है “नक्कली राष्ट्रवाद दिखाना और भीख मांग कर खाना”।

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मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु) , बीरगंज | “एगो फुटले फुटल, एगो के पेनिए ना” 

“एगो फुटले फुटल, एगो के पेनिए ना” मधेश में ये कहावत आए दिन सुनने को मिल रहा है। राष्ट्रपति बिद्या भंडारी और प्रधानमंत्री केपी ओली पर ये कहावत चरित्रार्थ होती है। दोनों मधेश और भारत बिरोधी। दोनों का इलाज भारत के रहमोकर्म पर हुआ, दोनों को जीवनदान मिला। पूरा सोशल मीडिया इनके चरित्र पर ऊँगली उठाने वाले पोस्ट से भरा पड़ा है।  मधेश के खिलाफ प्रचंड, ओली, कमल थापा सारे गीले शिक़वे, निति, नियम, मुद्दा छोड़कर एक हो गए। केपी ओली हमेशा माओवादियों के खिलाफ जहर उगलते थे, और माओवादी उन्हें पागल कहते नहीं थकती थी। आज दोनों प्रेमी युगल की तरह गलबहियां कर रहे है। कांग्रेस ने लोकतंत्र को ताक पर रख कर इनका सहयोग किया। सुशिल कोइराला का लुंजपुंज नेतृत्व कांग्रेस को पतन के राह पर पहुचा दिया। अपनी कमजोरी ढ़कने के लिए ये कहते है की मोदी को “कांग्रेस” शब्द से  ईष्या है, इसीलिए भारत के साथ साथ नेपाल के कांग्रेस को भी खत्म कर दिया। पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह ने भी मधेश के खिलाफ इनका पुरजोर साथ दिया। राजा का पद भंग होने के बाद बिद्या भंडारी और ज्ञानेन्द्र शाह मिले थे। बिद्या भंडारी ने नमस्कार किया जिसका आशीर्वाद अब मिला। इन सब से साबित होता है की इनका असली ध्यये मधेश को गुलाम करना और पहाड़ी सत्ता को बरक़रार रखना ही है। इनका एक ही सिद्धान्त है “नक्कली राष्ट्रवाद दिखाना और भीख मांग कर खाना”।

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ख़ैर, मधेश को इससे क्या फर्क पड़ने वाला है, चाहे साँपनाथ आएं या नागनाथ, दोनों डंसने का काम ही करेंगे। इधर मधेशी मोर्चा आंदोलन की आग में अपनी रोटी सेंक रहा है। ऐसा लगता है की आंदोलन की ठेकेदारी मोर्चा की है। क्या जितने लोग नाका पर जा रहे है, सब मोर्चा के नेतृत्व का परिणाम है ? मोर्चा तिन बाबा चला रहे है “मौनी बाबा, खैनी बाबा, दंभी बाबा”। मौनी बाबा कभी बोलते नहीं। खैनी बाबा खैनी की तरह मधेश को मसल कर रख दिए। दंभी बाबा अपने जाती के दम्भ में किसी को कुछ समझते नहीं।

आंदोलन में महंथ ठाकुर ज्यादातर समय काठमांडू में बिता दिए। मधेश में कुछ सांकेतिक कार्यक्रम करने के अलावे इनके संगठन का प्रभाव कही नहीं दिखा। उपेंद्र यादव कही भी आंदोलन में सक्रिय नहीं दिखे। इनरवा में अपने कार्यक्रम में मोर्चा के बाहर के नेता को मंच पर नहीं चढ़ने दिए, बाद में स्थानीय लोगो के बिरोध पर इनकी बोलती बंद हुई। क्यों अन्य मधेशी को रोका गया ? क्या उनका आंदोलन में योगदान नहीं है ? क्या आंदोलन सिर्फ मोर्चा की जमींदारी है ? क्या अकेले मोर्चा के दम पर आंदोलन सफल होगा ? इन्हें क्यों समझ नहीं आता की इस आंदोलन में जो भी चूक गया, उसके दल का सूपड़ा ही मधेश से साफ़ हो गया।

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राजेन्द्र महतो को लग रहा है की पुरे आंदोलन के वे नायक है। जबकि हकीकत है की आंदोलन के समय भी झूठा राजीनामा का ड्रामा करके मधेश को धोखा दिया, छल किया। अब जबकि इन्हें प्रायश्चित के तहत सभी मधेशी दल से एकता करके, मधेशी आवाम के चाह को पूरा करना चाहिए था, तब ये अपने दल के सदस्य बनाने में लगे है। शहीदों को अपमान करने वालो के घर खाने जाते है। क्या जो सदस्य बन रहे है वो आंदोलन पूरा होने तक रुकने वाले नहीं है ? जो रुकने वाले नहीं है वो आंदोलन के बाद इनके साथ टिकेंगे ? ये बालू में पानी दे रहे है। एक व्यक्ति के बजाय एक संगठन को जोड़ना मधेश हित में है, इतनी बात इनको समझ नहीं आती या फिर निहित स्वार्थ में समझना नहीं चाहते। इनकी सांसद माधवी रानी ने राष्ट्रपति में वोट दे कर इनको फिर नंगा कर दिया। अब क्या छलावा देंगे मधेश को ? मधेश कितने धोखे माफ़ करेगा ?

जनता क्या सोच रही है ? प्रधानमंत्री बन्ने के बाद केपी ओली का प्रमुख कार्य अपनी अगुवाई में वार्ता करके आंदोलन समाप्त करने का होना चाहिए था। मगर उन्हें जनता के दुःख से कोई सरोकार नहीं है। नेपाल और मधेश का दुर्भाग्य है की हमें नेल्सन मंडेला और गांधी नहीं मिले। अगर इसी तरह चलता रहा तो गांधी ना सही नाथू राम गोडसे जरूर मिलेंगे जो इनका संहार करेगा।

गैल भैंस पानी में ! नेपाल के दुश्मन तो सिर्फ भारत है, चीन तो कुल देवता हैं ! -बिम्मीशर्मा

मधेश में करीब तीन महीने से आन्दोलन हो रहा है । पर इस निक्कमी सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंग पाई । सरकार को मधेश आन्दोलन और औधोगिक शहर वीरगंज की कोई परवाह नहीं है । पर वहां के भंसार से उठने वाले राजस्व के बारे में बड़ी फिक्र है । हो भी क्यों न ? देश की सब से ज्यादा राजस्व बटोरने वाली यह भंसार सोने की अण्डे देने वाली मुर्गी है । देश की अर्थ व्यवस्था सरकार की नाकाममियों के चलते डावांडोल है ।

स सरकार को रतौंधी नही दिन में भी न दिखाई देनेवाला दिनौंघी हो गया है । सरकार सारे मधेशियों को और आन्दोलन मे मारे गए सभी को आतकंकारी देख रही है । क्योंकि अभी इस देश को दश साल तक देश में जनयुद्ध करने वाले जंगली और आतकंकारी चला रहे है । नए नवेले गृह मन्त्री ही जब किसी जमाने के ‘सम्मानित’ आतकंकारी है तो वह बांकी सबको भी उसी आंख से देखेंगे ।

अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए सीमावर्ती शहर वीरगंज आया हुआ एक युवक नेपाल पुलिस की गोली से मारा जाता है और उसपर भारत की उक्साहट से नेपाल में आ कर आतंक मचाने का आरोप लगाया जाता है । सवुत के तौर पर उसके पेंट के पाकेट से मिला भारतीय मोवाइल का सीम है । वाह क्या गज्जब है कोई भी भारतीय अब घूमने वा अन्य कारण से नेपाल आए तो वह नेपाली जनता और पुलिस की नजर में आतकंवादी और गुनाहगार है ।
सारे पहाड़ी गोरे, चिट्टे नेपाली दूध के धुले और ईमानदार है और सारे मधेश के लोग विशेष कर काले लोग सभी अपराधी हैं ? वर्षो पहले बर्मा से भाग कर आए हुए लोग नेपाली हो गए । भुटान से आए हुए लोग भी नेपाली हो गए । पर यहीं पैदा हुए और पले बढे, पुश्त दर पुश्त रहते आए मधेशी नेपाली नहीं हो सकते ? वह तो भारतीय है, उनकी भारतीय विस्तारवाद को बढावा दे रहा है ? वह भारत की उक्साहट पर नेपाल में आन्दोलन कर रहे है ? क्योंकि उनके पास तो दिमाग है ही नहीं ?

इस देश का दुश्मन तो सिर्फ भारत है ? चीन, अमेरिका, बेलायतऔर यूरोपियन यूनियन तो कुल देवता हैं नेपाल के ? यह तो नेपाल का अहित कर ही नहीं सकते ? बांकी सभी देश हमें मुफ्त में खाना और बांकी सारी वस्तुएं देगें ? इसी महिमा गान के स्वर तले नेपाल का मधेश आन्दोलन जल रहा है । पर उसकी जलन किसी को दिखाई नहीं देती ? क्योंकि दूसरों की जलन देखने के लिए खुद का जला हुआ आशियाना होना चाहिए । पर मधेश को आग की भेंट चढाने वाली नेपाल सरकार की आत्मा खाक हो चूकी है इसीलिए उसको कुछ महसुस नहीं होता ।

जब सरकार में सारे सड़े हुए, लड़ाकु और आतकंवादी को शामिल करेंगें तो सरकार और देश की आत्मा तो मरेगी ही । मधेश की जनता न्याय और समानता के लिए पिछले तीन महीने से आन्दोलन कर रही है । पर सरकार, मंत्री मंडल गठन और विस्तार, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के चुनाव और बालुवा टार में जश्न मनाने में व्यस्त है । उधर मधेश की जनता सरकार के तरफ से मुफ्त में मिला हुई गोली खा रही है । मधेश में पुलिस की गोली से मारे जाने वाले सभी आतंकारी को और मारने वाला पुलिस इस पुनीत कार्य के लिए भेजा गया यमराज का दूत ? सरकार यही कहना चाहती है न ?

नेपाल सरकार तो है ही दानव जैसी । पर यहाँ की जनता भी अब मानव नहीं रही । यहां की जनता के बदले तेवर बहुत खतरनाक हैं । वह किसी साम्प्रदायिक युद्ध की तैयारी जैसे भाव में है । इतना भेदभाव मधेशी और पहाडियों के बीच में पनप रहा है जैसे आने वाला कोई संकट का सूचक हो । राजधानी और पहाडी मूल के नेपाली इतने अराजक हो चुके हैं कि मधेशी, बिहारी, मोदी और भारत को कच्चा ही चबा जाएँगें । कोई भी देश गलत नहीं होता, देश को चलाने वाली सरकार और कुछ नौकरशाह की गलती या रवैया से किसी और देश या व्यक्ति को तकलीफ होती है । किसी देश को कोसना और गाली देना अपनी मां को गाली देने के समान है । पर हम अपनी कुण्ठाओं का भद्धा प्रदर्शन कर रहे हैं ।

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उग्र राष्ट्रवाद कभी किसी का भला नहीं करती । यह तो राष्ट्रवाद भी नहीं है । भारत को नाकाबंदी के लिए कोस रहे हैं पर चीन की वाहवाही कर रहे हैं । यह तो आसमान से गिरे और खजुर में अटके वाली बात हो गई । भारत को गाली देंगें पर चीन के तलुए चाट्ने से कोई परहेज नहीं है । चीन मे साम्यवाद है और नेपाल की सत्ता में भी अभी साम्यवाद खूब फलफूल रहा है । देश की सर्वोच्च पद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सभामुख, प्रधानमन्त्री और गृह मन्त्री सारे साम्यवादी ? पर यह मधेश आन्दोलनको साम्य नहीं कर पाए ? इनकी नीयत ही है मधेश को उस का हक न देना और खुद पाँचों उगंली घी में और सिर कड़ाही में डाल कर मौज करना ।

देश का विकास पीछे जा रहा है, राजस्व ठप्प है । जनता दैनिक वस्तुओं के अभाव से पीड़ित है । चारो तरफ हाहाकार है पर सरकार को कोई फर्क नहीं पड रहा । यह अंधी और बहरी सरकार एक भैंस पानी में चली गई तो क्या हुआ दुसरी दूधारु भैंस फिर से खरीद कर मौज करेंगें वाली शैली में जनता को ठेगां दिखा रही है । और जनता देख और भोग रही है बाबाजी का ठूल्लू ।

समय पर सोचने की आवश्यकता, कहीं चाभी विखण्डनकारी के हाथो में ना चला जाये ? एस.के.लाल, सिरहा  |

किसी यूद्ध अथवा द्वन्द्ध के बाद मे किसी भूभाग का बटवारा उस भूभाग के बासिन्दों के लिये बहुत दुखदायी और पीड़ादायी होती है । चाहे वह दिवतीय विश्वयुद्घ के वाद हुई जर्मनी का बटवारा हो चाहे कोरिया प्रायद्घीप का बटवारा हो चाहे भारत के स्वतन्त्रता के बाद भारत पाकिस्तान का बटवारा हो । नेपाल और ईष्ट ईन्डिया कम्पनी के बीच में युद्घ के बाद सुगौली सन्धि हुआ और उसमे नेपाल का दक्षिणी मैदानी भु भाग जो युद्घ से पहले गंगा नदी तक फैला हुआ था वह संकुचित होकर हाल का दशगजा क्षेत्र तक आ गया । उस लड़ाई में नेपाल ने जो गवाया अथवा ईष्ट ईन्डिया कम्पनी सरकार ने जो पाया वो अपनी जगह पर है पर सबसे पीड़ित उस मैदानी भुभाग मे रहने बाले हुए । मैथिल, भोजपुरी और अवध का वो अखण्ड भुभाग जो नेपाल में था वो खण्डित हो गया और उस भुभाग का कुछ भाग भारत में चला गया और बांकी नेपाल में रह गया जिसकी वजह से उसमें बसोवास करने वालाें के खेत खलिहान से लेकर अपने परिजनो से भी देशबासियों का सम्बन्ध बन गया । भुभाग खण्डन मे हुए इस पीडा पर मलहम पट्टी करने के लिये उसी सन्धि में दोनो देशाें के बीच में खुला आवागमन का छूट दिया गया जो आज तक कायम है । यह बात स्मरणीय रहे कि उस सम्पूर्ण मैदानी तराई भुभाग को नेपाल में पहाड़ी शासक के द्वारा मधेश कहकर मधेश शब्द का जन्म और अस्तित्व कायम हुवा । और इस तरह आधा से ज्यादा भाग भारत में पड़ा और बाकी भाग नेपाल में रह गया । उस लडाई के बाद मधेशी जो भारतीय भुभाग मे चले गये वो बिहारी होते हुये स्वतंत्र भारत के प्रथम श्रेणीके नागरिक होकर स्वतंत्रता की अनुभूित लेते रहे । जो मधेशी नेपाली भुभाग में रह गये उसको नेपाल के पहाड़ी शासक रंगरुप के आधार पर शोषण दमन कर शासन करते रहे । जो उनकी आदत बन गई और आज भी नेपाल के मधेशी एक स्वतंत्र नेपाल में रहकर भी स्वतंत्रता की अनुभूति नही कर पायी । और अपने को अवहेलित महसुस कर रही है । इतिहास साक्षी है कि नेपाल के तराई मधेश में विधमान मैथिली, भोजपुरी और मगध सभ्यता हजारो बर्ष पुराना है । जिसका वर्णन रामायण और महाभारत मे भी उल्लेख है । उस समय मे नेपाल और नेपाली सभ्यता का उदगम और विकास ही नहीं हो पाया था । अत ः ये कहना अतिशयोत्ति नही. होगी कि मधेश की सभ्यता और मधेशी लोग आदीकाल से इस भूमि के भूमि पुत्र बनकर रह रहे है । करीब २५० बर्ष पहले गोरखा मे पृथ्वी नारायण शाह के उदय के बाद उत्तरमें हिमालय पर्वतमाला से लेकर गंगा के मैदानी भाग तक जो छोटे छोटे राज्य थे उसको एकीकरण के अभियान मे दक्षिण गंगा तक का मधेश का भुभाग जो उस समय सिम्रौनगढ में पड़ता था वो भी गोरखा साम्राज्य में समाहित होकर नया नेपाल का अंग वना और राजधानी काठमाडौं हुई । उसके वाद काठमाडौं के शासन मे पहाड़ी ब्राहम्ण और क्षेत्री का दवदवा हो गया । उनलोगो ने पहाडी ब्राह्मण और क्षत्रीमुखी शासन पद्घति कायम किया जिसमें दक्षिण के मैदानी भाग में हजारो बर्षौ से रहनेवाले भुमि पुत्र मधेशियाें के लिये कोई स्थान नहीं था । मधेशी पूर्ण रूप से दूसरे श्रेणी के रैती हो गये और सिलसिला आज तक चल रहा है ।

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अब समय परिवर्तन हो गया है । मधेशीयो मे भी चेतना आई है और वो अपना पहचान, अंश, समृद्घि और स्थायित्व माग रही है तो उसे पहाडी शासक लोग समय सापेक्ष माग के रूप में लेना चाहिये । आज तीसरा मधेश आन्दोलन को तीन महीने होने को है ।…आन्दोलन चरम पर है । तराई मधेश की जनता के साथ सारा देश त्राहिमाम मचा हुवा है । सरकार सत्ता सुख का आननद ले रही है । अभी तक ये आन्दोलन देश भक्त और राष्ट्र्वादी के हाथ में है पर अंदेशा है कि यह इसी तरह लंबा चलता रहा तो कही इस की चाभी विखण्डनकारी के हाथो में ना चला जाये और वेैसा हुवा तो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा इसलिये आज आवश्यता है कि विधमान मधेश आन्दोलन के माग को उचित सम्बोधन कर मधेश और मधेशियो को राष्ट्र के मुख्य धारा में लाया जाय और देश में खुशहाली हो और देश समृद्घि की ओर बढे ।

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