मङ्गलबार, ०६ चैत २०७४, १३ : ३०

वे भी क्या दिन थे by Sri Sampat Saral

वे भी क्या दिन थे जब घडी एक आध के पास होती थी और समय सबके पास,

आज की तरह नहीं था की फेसबुक पर पांच हज़ार दोस्त हैं और परिवार में बोलचाल बंद है !

तब मोबाइल तो क्या लैंड लाइन फ़ोन तक नहीं होता था

अतः झूट सिर्फ आमने सामने मिलने पर ही बोला जाता था !

खानपान शुद्ध था और यादास्त अच्छी थी

हरेक  व्यक्ति को सात सात पीढ़ियां याद रहती थी

अपनी भी और गालीगलौज होने पर दूसरे की भी !

सच है गन्ने का रस सुख जाये तो

वो लाठी रह जाता है

पहले हमारा जीवन कछुए की तरह था

आज हम खरगोस की तरह दौड़ रहे हैं,

अर्थात भाग सब रहे हैं,

पर पहुँच कोई नहीं रहा !

Sampath-GI2

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